विश्व दास प्रथा उन्मूलन दिवस

 मानव समाज में जीतने भी संस्थाओं का गठन हुआ है।उनमें सबसे भयावह दासता की प्रथा रही है। मनुष्य के हाथों मनुष्य का ही बडे़ पैमाने  पर उत्पीड़न इस प्रथा के अंतर्गत हुआ है। दास प्रथा एक बुरी प्रथा थी जिसमें लोगों को उनकी मर्जी के खिलाफ काम करने को बाध्य किया जाता था।सामान की तरह बेचा और खरीदा जाता था। दास प्रथा का इतिहास का अतिप्राचीन काल से ही विश्व की विभिन्न सभ्यताओं में रहा है। इस प्रथा से भारत भी अछूता नहीं रहा है।भारत मे करीब छह करोड़ लोगों को बंधक बनाकर दूसरे देशों मे गुलाम के तौर पर बेच दिया गया। भारत मे मुस्लिमों के शासनकाल मे दास प्रथा मे बहुत बृद्धि हुई।यह भारत मे ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद भी चलती रही। दास से मूलतः अभिप्राय  यह है कि दास किसी दूसरी व्यक्ति द्वारा अधिकृत और पूर्ण तरह या अधिकांशतः अधिकारों एवं स्वतंत्रता से रहित व्यक्ति होता है।  वह मालिक  की निजी सम्पति होता है। जो अपने स्वामी की इच्छा पर आश्रित रहता है।और स्वामी उसे किसी भी प्रकार के कार्य के लिए मजबूर कर सकता है। और तो और उसे उसके जीवन से भी वंचित कर सकता है।एशिया यूरोप अफ्रीका अमरिका आदि सभी भूखण्डो मे उदय होने वाली सभ्यताओं के इतिहास में दासता ने  सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्थाओं के निर्माण एवं परिचालन मे महत्वपूर्ण योगदान किया है। जो सभ्यतायें प्रधानतया तलवार के बल पर बनी बढी और टिकी थी।उनमे दासता नग्न रुप मेपायी जाती थी।पश्चिमी सभ्यता के विकास के इतिहास में दास प्रथा ने विशिष्ट भूमिका अदा की है।किसी अन्य सभ्यता के विकास में दासों ने सम्भवतः न इतना विकास मे योगदान दिया है। और न दासता के नाम पर मनुष्य द्वारा मनुष्य का ही इतने बडे़ पैमाने पर शोषण हुआ है।पाश्चात्य सभ्यता के सभी युगों में यूनानी रोमन मध्यकालीन आधुनिककाल मे दासों ने सभ्यता की भब्य इमारत को अपने पसीने और रक्त से उठाया है। भारत मे दास प्रथा समाप्त करने के लिए लार्ड एलेनबरो ने 1843 मे गुलामी अधिनियम बनाकर गुलामी को अवैध घोषित कर दिया था। धीरे - धीरे विश्व के देशों और भारत मे भी दास प्रथा का उन्मूलन होता जा रहा है।यह मानव समाज के लिए कलंक है।और इसका सभी प्रकार से सम्पूर्ण मानव समाज से अन्त होना चाहिए।

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